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विराट पर्व
अध्याय २७
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मात्मा स तदादृश्यः सोऽपि तात द्विजातिभिः |  २५   क
किं पुनः प्राकृतैः पार्थः शक्यो विज्ञातुमन्ततः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति