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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
दिष्ट्या त्वद्य महावाहो धृतराष्ट्रः प्रय़ाचति |  ११   क
याचितो यः पुरास्माभिः पश्य कालस्य पर्ययम् ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति