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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
राजानमुपतिष्ठस्व ज्येष्ठं भ्रातरमीश्वरम् |  १४   क
अर्हस्त्वमसि दातुं वै नादातुं भरतर्षभ |  १४   ख
एवं व्रुवाणं कौन्तेय़ं धर्मराजोऽभ्यपूजय़त् ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति