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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
कुतस्त्वमद्य विस्मृत्य वैरं द्वादशवार्षिकम् |  १९   क
अज्ञातवासगमनं द्रौपदीशोकवर्धनम् |  १९   ख
क्व तदा धृतराष्ट्रस्य स्नेहोऽस्मास्वभवत्तदा ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति