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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
किं ते तद्विस्मृतं पार्थ यदेष कुलपांसनः |  २२   क
दुर्वृत्तो विदुरं प्राह द्यूते किं जितमित्युत ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति