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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १७
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वैशम्पाय़न उवाच
स त्वा कुरुकुलश्रेष्ठ किञ्चिदर्थमभीप्सति |  ४   क
श्राद्धमिच्छति दातुं स गाङ्गेय़स्य महात्मनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति