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वन पर्व
अध्याय २५८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ईशानेन तथा सख्यं पुत्रं च नलकूवरम् |  १६   क
राजधानीनिवेशं च लङ्कां रक्षोगणान्विताम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति