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सभा पर्व
अध्याय १७
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कृष्ण उवाच
प्रविश्य नगरं चैव ज्ञातिसम्वन्धिभिर्वृतः |  २१   क
अभिषिच्य जरासन्धं मगधाधिपतिस्तदा |  २१   ख
वृहद्रथो नरपतिः परां निर्वृतिमाय़यौ ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति