वन पर्व  अध्याय १७

वासुदेव उवाच

समे निविष्टा सा सेना प्रभूतसलिलाशय़े |  २   क
चतुरङ्गवलोपेता शाल्वराजाभिपालिता ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति