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वन पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
तय़ा त्वभिहतो राजन्वेगवानपतद्भुवि |  २०   क
वातरुग्ण इव क्षुण्णो जीर्णमूलो वनस्पतिः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति