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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः |  ६७   क
सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जञ्शशलक्षणः |  ६७   ख
पुनर्वर्धिष्यते देवास्तद्वै सत्यं वचो मम ||  ६७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति