वन पर्व  अध्याय १७

वासुदेव उवाच

अहं सौभपतेः सेनामाय़सैर्भुजगैरिव |  ३१   क
धनुर्भुजविनिर्मुक्तैर्नाशय़ाम्यद्य यादवाः ||  ३१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति