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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तस्यास्तनुमध्याय़ाः समीपे रजनीचरः |  ६   क
ददृशे रोहिणीमेत्य शनैश्चर इव ग्रहः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति