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वन पर्व
अध्याय १७
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वासुदेव उवाच
अनीकानां विभागेन पन्थानः षट्कृताभवन् |  ४   क
प्रवणा नव चैवासञ्शाल्वस्य शिविरे नृप ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति