वन पर्व  अध्याय १७

वासुदेव उवाच

तुष्टपुष्टजनोपेतं वीरलक्षणलक्षितम् |  ६   क
विचित्रध्वजसंनाहं विचित्ररथकार्मुकम् ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति