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कर्ण पर्व
अध्याय ५७
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कर्ण उवाच
एतावहं युधि वा पातय़िष्ये; मां वा कृष्णौ निहनिष्यतोऽद्य |  ५०   क
इति व्रुवञ्शल्यममित्रहन्ता; कर्णो रणे मेघ इवोन्ननाद ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति