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विराट पर्व
अध्याय १७
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द्रौपद्यु उवाच
शतं दासीसहस्राणि यस्य नित्यं महानसे |  १७   क
पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन्भोजय़न्त्युत ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति