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द्रोण पर्व
अध्याय १५२
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सञ्जय़ उवाच
रक्षसा विप्रमुक्तस्तु कर्णोऽपि रथिनां वरः |  १६   क
अभ्यद्रवद्भीमसेनं रथेनादित्यवर्चसा ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति