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वन पर्व
अध्याय २६७
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मार्कण्डेय़ उवाच
स यत्काष्ठं तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मय़ि |  ४२   क
सर्वं तद्धारय़िष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति