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उद्योग पर्व
अध्याय १७
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अगस्त्य उवाच
त्रिविष्टपं प्रपद्यस्व पाहि लोकाञ्शचीपते |  १७   क
जितेन्द्रिय़ो जितामित्रः स्तूय़मानो महर्षिभिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति