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उद्योग पर्व
अध्याय १७
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शल्य उवाच
सोऽव्रवीदर्च्य देवेन्द्रं दिष्ट्या वै वर्धते भवान् |  २   क
विश्वरूपविनाशेन वृत्रासुरवधेन च ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति