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भीष्म पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
शुशुभे केतुमुख्येन पादपेन कलिङ्गपः |  ३४   क
श्वेतच्छत्रेण निष्केण चामरव्यजनेन च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति