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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
वाहास्तेषां विवृत्ताक्षाः स्तव्धकर्णशिरोधराः |  १०   क
विष्टव्धचरणा मूत्रं रुधिरं च प्रसुस्रुवुः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति