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द्रोण पर्व
अध्याय १४३
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सञ्जय़ उवाच
सोऽतिविद्धो वलवता पुत्रेण तव धन्विना |  ३२   क
विरराज महावाहुः सशृङ्ग इव पर्वतः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति