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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तांस्तु सर्वान्पृथग्वाणैर्वानरप्रवरध्वजः |  २१   क
प्रत्यविध्यद्ध्वजांश्चैषां भल्लैश्चिच्छेद काञ्चनान् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति