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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
सुधन्वनो धनुश्छित्त्वा हय़ान्वै न्यवधीच्छरैः |  २२   क
अथास्य सशिरस्त्राणं शिरः काय़ादपाहरत् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति