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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
ततो भग्ने वले तस्मिन्विप्रय़ाते समन्ततः |  २५   क
सव्यसाचिनि सङ्क्रुद्धे त्रैगर्तान्भय़माविशत् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति