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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
स शव्दः प्रदिशः सर्वा दिशः खं च समावृणोत् |  ३   क
आवृतत्वाच्च लोकस्य नासीत्तत्र प्रतिस्वनः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति