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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्तास्तु ते राजन्नुदक्रोशन्मुहुर्मुहुः |  ३०   क
शङ्खांश्च दध्मिरे वीरा हर्षय़न्तः परस्परम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति