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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
अतीव सम्प्रहृष्टांस्तानुपलभ्य धनञ्जय़ः |  ४   क
किञ्चिदभ्युत्स्मय़न्कृष्णमिदं वचनमव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति