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द्रोण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तेन शव्देन वित्रस्ता संशप्तकवरूथिनी |  ९   क
निश्चेष्टावस्थिता सङ्क्ये अश्मसारमय़ी यथा ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति