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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
अपरे निष्टनन्तः स्म व्यदृश्यन्त महाद्विपाः |  १०५   क
क्षरन्तः शोणितं गात्रैर्नगा इव जलप्लवम् ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति