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शल्य पर्व
अध्याय ५७
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वासुदेव उवाच
सृत्या वञ्चय़तो राजन्पुनरेवोत्पतिष्यतः |  ४३   क
ऊरुभ्यां प्राहिणोद्राजन्गदां वेगेन पाण्डवः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति