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वन पर्व
अध्याय ८३
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नारद उवाच
मय़ा च सह धर्मज्ञ तीर्थान्येतान्यनुव्रज |  १०७   क
प्राप्स्यसे महतीं कीर्तिं यथा राजा महाभिषः ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति