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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
ते वध्यमानाः समरे सूतपुत्रेण सृञ्जय़ाः |  ११७   क
तमेवाभिमुखा यान्ति पतङ्गा इव पावकम् ||  ११७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति