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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
स तं निर्भिद्य वेगेन भित्त्वा च कवचं महत् |  ४४   क
प्राविशद्धरणीं राजन्वल्मीकमिव पन्नगः |  ४४   ख
ततः स मुमुहे राजंस्तव पुत्रो महारथः ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति