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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
मूढं चैनं समालक्ष्य सारथिस्त्वरितो रथम् |  ४५   क
अपोवाह भृशं त्रस्तो वध्यमानं शितैः शरैः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति