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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
यस्य मे त्वं रणे पाप चक्षुर्विषय़मागतः |  ५०   क
त्वं हि मूलमनर्थानां वैरस्य कलहस्य च ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति