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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
प्रहरस्व रणे वाल पश्यामस्तव पौरुषम् |  ५३   क
कर्म कृत्वा रणे शूर ततः कत्थितुमर्हसि ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति