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अनुशासन पर्व
अध्याय ४७
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भीष्म उवाच
क्षत्रिय़स्यापि भार्ये द्वे विहिते कुरुनन्दन |  ४७   क
तृतीय़ा च भवेच्छूद्रा न तु दृष्टान्ततः स्मृता ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति