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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
एकैकं दशभिः षड्भिरष्टाभिरपि भारत |  ६   क
द्विरदानभिविव्याध क्षिप्तैर्गिरिनिभाञ्शरैः |  ६   ख
प्रच्छाद्यमानो द्विरदैर्मेघैरिव दिवाकरः ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति