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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
वाणजालावृते व्योम्नि छादिते च दिवाकरे |  ७१   क
समसर्पत्ततो भूतं किञ्चिदेव विशां पते ||  ७१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति