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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
प्रोत्सारिते जने तस्मिन्कर्णपाण्डवय़ोः शरैः |  ७६   क
विव्याधाते महात्मानावन्योन्यं शरवृष्टिभिः ||  ७६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति