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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
नकुलेन शरा मुक्ताः कङ्कवर्हिणवाससः |  ७८   क
ते तु कर्णमवच्छाद्य व्यतिष्ठन्त यथा परे ||  ७८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति