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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
ततः क्रुद्धो रणे कर्णः कृत्वा घोरतरं वपुः |  ८०   क
पाण्डवं छादय़ामास समन्ताच्छरवृष्टिभिः ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति