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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
एकच्छाय़मभूत्सर्वं तस्य वाणैर्महात्मनः |  ८३   क
अभ्रच्छाय़ेव सञ्जज्ञे सम्पतद्भिः शरोत्तमैः ||  ८३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति