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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
हताश्वो विरथश्चैव विवर्मा च विशां पते |  ८७   क
अवतीर्य रथात्तूर्णं परिघं गृह्य विष्ठितः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति