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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तमव्रवीत्तदा कर्णो व्यर्थं व्याहृतवानसि |  ९३   क
वदेदानीं पुनर्हृष्टो वध्यं मां त्वं पुनः पुनः ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति