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कर्ण पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
तं विसृज्य रणे कर्णः पाञ्चालांस्त्वरितो यय़ौ |  ९८   क
रथेनातिपताकेन चन्द्रवर्णहय़ेन च ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति