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शल्य पर्व
अध्याय १७
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालानां महावीर्याः शिखण्डी च महारथः |  १३   क
धृष्टद्युम्नोऽथ शैनेय़ो द्रौपदेय़ाश्च सर्वशः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति